अभिषेक शुक्ला की यह कविता - चलते हुए मुझ में कहीं ठहरा हुआ तू है
अतीत में फंसे रहना यह अपनी पीठ को सामने की ओर करके आगे चलने जैसा है। जो आपके सामने है उसे आप हमेशा चूकते रहेंगे।
Personal
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29
Apr
2024 12:57 PM
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