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शिक्षा का उद्देश्य अज्ञान के अंधकार को दूर करके विद्यार्थी के अन्तःस्तल में ज्ञान रश्मियों का आलोक बिखेरना है। शिक्षा हमें असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली दिव्य साधना है । मनुष्य में देवत्व का अमृत बिखेरने वाली सजस्र धारा है। शिक्षा न नौकरी के लिए बनी है, न ही फैशन और प्रदर्शन के लिए, न ही विद्यालय परिसर में अराजकता का वातावरण उत्पन्न करने के लिए। बेचारी शिक्षा तो विद्या मंदिर में, दिये की लौ बनकर प्रविष्ट हुई थी। भीष्म पितामह इसके संरक्षक थे और द्रोण इस लौ को प्रज्ज्वलित करने वाले पुरोहित। मूंज की कठोर करधनी पहने कान तक धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाये अर्जुन जैसे वीर बालक इससे आलोकित होते थे । वे महाभारत से विश्वयुद्ध के बनते और अपनी अद्भुत मेधा के बाल पर विराट स्वयंवर में विजयश्री प्राप्त करते थे ।         सच्चे विद्यार्थी पाटलिपुत्र,  काशी और तक्षशिला तक की यात्रा करते थे। उनके पैरों में पड़े छाले उन्हें विद्या के महत्व से अवगत कराती थी। गुरुजनों के कठोर नियंत्रण में वे लौह पुरुष बनते थे । कठोर धरती उनकी शैय्या थी और खुला आकाश उनका सुसज्जित विमान था। भिक्षा का अन्न ही उनके पोषण का आधार था। यशोदानंदन कृष्ण भी गुरु के आदेश पर वन में लकड़ियाँ काटते थे। सिंहों के साथ खेलने वाले वीर भरत इस पुण्य धरा पर अवतरित होते थे। शास्त्रार्थ में ऋषियों को परस्त करने वाली गार्गी, अपाला और घोषा जैसी विदुषी हमारे देश में जन्म लेती थीं । गुरु ऐसे थे जो अपने हृदय रुपी सागर से सारे रत्न शिष्य की झोली में उड़ेल देते थे और शिष्य भी ऐसे निष्ठावान थे कि गुरु के आदेश पर अपने हाथ का अंगूठा अर्पित कर देते थे।       कहाँ खो गया भारत का वह स्वर्णिम अतीत ? न ही वशिष्ठ जैसे गुरु रहे और न ही राम-लक्ष्मण जैसे तपःपूत शिष्य, न ही रामकृष्ण परमहंस जैसे महर्षि रहे न ही विवेकानंद जैसे श्रद्धालु शिष्य,  शिक्षा अध्यात्मवाद से हटकर भौतिकवाद के गर्त में प्रविष्ट हो गयी। लार्ड मैकाले को भारत में कुशल लिपिकों का निर्माण करना था। उसने शिक्षण-प्रशिक्षण की जो पद्धति निर्मित की,  वही सम्पूर्ण भारत में पूर्ण भक्ति भाव से अपनायी जा रही है ।        स्वतंत्रता के ७५ वर्ष बीत जाने के पश्चात् भारत के अभिमन्यु और शंकराचार्य उसी पद्धति से दीक्षित किये जा रहे हैं। शिक्षा पहले एक साधना थी अब एक व्यवसाय बन गयी है। आज वह मात्र नौकरी प्राप्त करने का साधन बन गयी है । पहले वह अपने जीवन के मार्ग प्रशस्त करती थी आज वह सूचनाओं के संसार में उलझ गयी है। आज विद्या प्रांगण दलगत राजनीति, परस्पर द्वेष भाव और नशाखोरी के केंद्र बनते जा रहे हैं। कल ही की बात है किन गुरु के आदेश पर विवेकानंद ने सम्पूर्ण भारत को अपने ज्ञान से आलोकित कर विश्व में अपने ज्ञान की पताका फहराई थी। कितना शीघ्र पतन हो गया उस विश्व गुरु भारत का ? राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों में भारत की शिक्षा व संस्कृति की गुरुता दिव्यता सन्निहित है -----                हाँ वृद्ध भारतवर्ष ही संसार का सिरमौर है।                ऐसा पुरातन देश क्या ? विश्व में कोई और है !                धर्मोपदेशक विश्व में जाते जहाँ से थे सदा।                शिक्षार्थ आते थे जहाँ, संसार के जन सर्वदा। कभी अभिमन्यु गर्भ में ही चक्रव्यूह भेदन की कला सीख लेता था। आज माँ के गर्भ में शिशु मदिरापान, दुराचार, एड्स के कीटाणु धारण कर पृथ्वी पर अवतरित होता है। शैक्षिक गुणवत्ता के पतन का सारा दोष शिक्षकों पर आरोपित नहीं किया जा सकता। बालक अपने परिवार एवं कुमित्र समूह से प्राप्त संस्कार लेकर विद्यालय में प्रवेश करता है । वह अपने माता-पिता के चरण स्पर्श नहीं करता तो गुरु को प्रणाम कैसे करेगा ? उधर शिक्षक भी बालकों को वह ममत्व और ज्ञान नहीं दे पाते जिसकी अपेक्षा करके बालक विद्यालय में प्रविष्ट हुआ है ।                    शिक्षक पर ट्यूशन पढ़ाने का आरोप प्रायः लगाया जाता है ! प्रश्न यह  ? कि शिक्षक ट्यूशन से क्या छात्रों का बौद्धिक विकास कर रहा है अथवा धनोपार्जन मात्र में लिप्त है । यदि मंद-बुद्धि बालक ट्यूशन से लाभान्वित होकर परीक्षा में उच्च अंक अर्जित कर सफल होते हैं तो ट्यूशन पाप कैसे है ? वह तो सहायता मात्र है, रिश्वत नहीं।  प्रतिष्ठित सामाजिक जीवन बिताने की लालसा शिक्षक में भी होती है। दरिद्रता का अभिशाप ओढ़कर भला वह कब तक जीवन-यापन करे ।        शासन की दोहरी नीति चिंता का विषय है,  शिक्षा में उदारीकरण और शिक्षक नियंत्रण द्वारा सरकार ट्यूशन को प्रतिबंधित करती है और गली-गली में खुल रहे कोचिंग संस्थानों को बढ़ावा देती है । एक परिपक्व तथा प्रशिक्षित अध्यापक अपने निवास पर छात्रों को अज्ञान से निकल कर प्रकाश की किरण देता है। परीक्षापयोगी दिशा निर्देश देता है, परन्तु आज प्रत्येक गली में अपरिपक्व, अप्रशिक्षित व अनुभवहीन छात्राध्यापकों द्वारा सीधे-सादे छात्रों का भविष्य बिगाड़ा जा रहा है। कक्षा से अरुचि उत्पन्न करके विद्यालय के ही समय में उनसे बेंच लगाकर धन उगाही की जा रही है। व्यवस्था की यह विश्रंखलता प्रबुद्ध सेवारत शिक्षक के पढ़ने को नैतिक अपराध मानता है ।        वस्तुस्थिति यह है कि आज का शिक्षक एक मशीनीकृत प्रक्रिया में कलपुर्जा मात्र बनकर रह गया है। वह कक्षा में स्वतंत्र अभिव्यक्ति देने में असमर्थ है। उसके निजी चिंतन-मनन का कोई अर्थ नहीं है वह निर्धारित पाठ्यक्रम और अवधि में सीमित होकर रह गया है। एक निश्चित समय-सारिणी के अंतर्गत वह एक कक्षा से दूसरी कक्षा में गमनागमन करता रहता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है। जिसमे महान वैज्ञानिक आर्कमिडीज और गणितज्ञ रामानुजन अनुत्तीर्ण हो जाते है।        फिर भी यह कहना यथेष्ट होगा की शिक्षक ही समाज का निर्माता है। अतः वह अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं हो सकता। समाज कितना ही दूषित हो। उसे अपने कर्तव्य-रथ पर आरूढ़ होकर ज्ञान का आलोक बिखेरना ही होगा, उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह किसी प्रकार के व्यसन में लिप्त ण होकर उत्तम आचरण का निर्वहन करे। प्रत्येक अध्यापक डॉ राधाकृष्णन या डॉ जाकिर हुसैन नहीं बन सकता किन्तु आदर्श शिक्षक बनकर छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत अवश्य बन सकता है। वह देवता न बने पर मनुष्य बनकर ही मानवता की बेल को हरा-भरा बनाये, शिक्षक का पद महन है अतः उसका आचरण गरिमायुक्त होना चाहिए।  कितना सुन्दर हो यदि शिक्षक दलीय राजनीति से ऊपर उठकर उन्मुक्त भाव से विद्यादान कर अपने शिष्यों में पुरुषार्थ-चतुष्टय सफल करें। शिक्षा का स्वरुप कितना ही विकृत एवं अशोभनीय हो। शिक्षार्थी के लिए उसका विद्यालय विश्वमंदिर से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। विद्यालय के गुरुजन ही उसके मन-मस्तिष्क में आलोक बिखेरने वाले प्रकाश-पुंज और सर्वथा वन्दनीय है।  वही विद्यार्थी देश और समाज का नाम ऊँचा करता है जो सदाचारी और परिश्रमी होता है। आचरण का महत्व सर्वोपरि है। वह इहलोक और परलोक दोनों में लाभकारी है।              आचाराल्लभते ह्रायुश्चाराल्लभते श्रियम ।             आचारात कीर्तिमाप्नोति पुरुष प्रेत्य चेह च । विद्या प्राप्ति एक अनवरत साधना है जिससे सफलता प्राप्त करने के लिए पञ्च लक्षण बताये गए हैं ---            काकचेष्टा वकोध्यानं, श्वाननिद्रा तथैव च।            अल्पाहारी, सदाचारी विद्यार्थी पञ्च लक्षण:। भारत ज्ञान-विज्ञान तकनीक तथा प्रौद्योगिकी, प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति-पथ पर अग्रसर है, प्रगति के इस दौर में कहीं हमारी सांस्कृतिक धरोहर छूट न जाये । भारत ने सदैव विश्व में ज्ञान की रश्मियाँ बिखेरी हैं,  हमें आशा है कि भारत में शिक्षा की यह विरासत सुरक्षित रहेगी। ईश्वर से हमारी मंगलकामना है कि हमारे देश के शिक्षार्थी, संयमी, धैर्यवान, विवेकशील व विद्याभिलाषी बनें। वे विवेकानन्द से प्रेरणा लेकर संसार में ज्ञान रुपी आलोक की ज्योति प्रसारित करें। तभी शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी की यह त्रिवेणी लोकमंगलकारी सिद्ध होगी ।हम तो बस यही कामना करते हैं कि………           असतो मा सद्गमय,           तमसो मा ज्योतिर्गमय,            मृत्योर्मामृतं गमय !

शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी: बदलते आयाम 

Lifestyle

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18
Jul
2024 1:24 PM

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शिक्षा का उद्देश्य अज्ञान के अंधकार को दूर करके विद्यार्थी के अन्तःस्तल में ज्ञान रश्मियों का आलोक बिखेरना है। शिक्षा हमें असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली दिव्य साधना है । मनुष्य में देवत्व का अमृत बिखेरने वाली सजस्र धारा है। शिक्षा न नौकरी के लिए बनी है, न ही फैशन और प्रदर्शन के लिए, न ही विद्यालय परिसर में अराजकता का वातावरण उत्पन्न करने के लिए। बेचारी शिक्षा तो विद्या मंदिर में, दिये की लौ बनकर प्रविष्ट हुई थी। भीष्म पितामह इसके संरक्षक थे और द्रोण इस लौ को प्रज्ज्वलित करने वाले पुरोहित। मूंज की कठोर करधनी पहने कान तक धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाये अर्जुन जैसे वीर बालक इससे आलोकित होते थे । वे महाभारत से विश्वयुद्ध के बनते और अपनी अद्भुत मेधा के बाल पर विराट स्वयंवर में विजयश्री प्राप्त करते थे ।         सच्चे विद्यार्थी पाटलिपुत्र,  काशी और तक्षशिला तक की यात्रा करते थे। उनके पैरों में पड़े छाले उन्हें विद्या के महत्व से अवगत कराती थी। गुरुजनों के कठोर नियंत्रण में वे लौह पुरुष बनते थे । कठोर धरती उनकी शैय्या थी और खुला आकाश उनका सुसज्जित विमान था। भिक्षा का अन्न ही उनके पोषण का आधार था। यशोदानंदन कृष्ण भी गुरु के आदेश पर वन में लकड़ियाँ काटते थे। सिंहों के साथ खेलने वाले वीर भरत इस पुण्य धरा पर अवतरित होते थे। शास्त्रार्थ में ऋषियों को परस्त करने वाली गार्गी, अपाला और घोषा जैसी विदुषी हमारे देश में जन्म लेती थीं । गुरु ऐसे थे जो अपने हृदय रुपी सागर से सारे रत्न शिष्य की झोली में उड़ेल देते थे और शिष्य भी ऐसे निष्ठावान थे कि गुरु के आदेश पर अपने हाथ का अंगूठा अर्पित कर देते थे।       कहाँ खो गया भारत का वह स्वर्णिम अतीत ? न ही वशिष्ठ जैसे गुरु रहे और न ही राम-लक्ष्मण जैसे तपःपूत शिष्य, न ही रामकृष्ण परमहंस जैसे महर्षि रहे न ही विवेकानंद जैसे श्रद्धालु शिष्य,  शिक्षा अध्यात्मवाद से हटकर भौतिकवाद के गर्त में प्रविष्ट हो गयी। लार्ड मैकाले को भारत में कुशल लिपिकों का निर्माण करना था। उसने शिक्षण-प्रशिक्षण की जो पद्धति निर्मित की,  वही सम्पूर्ण भारत में पूर्ण भक्ति भाव से अपनायी जा रही है ।        स्वतंत्रता के ७५ वर्ष बीत जाने के पश्चात् भारत के अभिमन्यु और शंकराचार्य उसी पद्धति से दीक्षित किये जा रहे हैं। शिक्षा पहले एक साधना थी अब एक व्यवसाय बन गयी है। आज वह मात्र नौकरी प्राप्त करने का साधन बन गयी है । पहले वह अपने जीवन के मार्ग प्रशस्त करती थी आज वह सूचनाओं के संसार में उलझ गयी है। आज विद्या प्रांगण दलगत राजनीति, परस्पर द्वेष भाव और नशाखोरी के केंद्र बनते जा रहे हैं। कल ही की बात है किन गुरु के आदेश पर विवेकानंद ने सम्पूर्ण भारत को अपने ज्ञान से आलोकित कर विश्व में अपने ज्ञान की पताका फहराई थी। कितना शीघ्र पतन हो गया उस विश्व गुरु भारत का ? राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों में भारत की शिक्षा व संस्कृति की गुरुता दिव्यता सन्निहित है -----                हाँ वृद्ध भारतवर्ष ही संसार का सिरमौर है।                ऐसा पुरातन देश क्या ? विश्व में कोई और है !                धर्मोपदेशक विश्व में जाते जहाँ से थे सदा।                शिक्षार्थ आते थे जहाँ, संसार के जन सर्वदा। कभी अभिमन्यु गर्भ में ही चक्रव्यूह भेदन की कला सीख लेता था। आज माँ के गर्भ में शिशु मदिरापान, दुराचार, एड्स के कीटाणु धारण कर पृथ्वी पर अवतरित होता है। शैक्षिक गुणवत्ता के पतन का सारा दोष शिक्षकों पर आरोपित नहीं किया जा सकता। बालक अपने परिवार एवं कुमित्र समूह से प्राप्त संस्कार लेकर विद्यालय में प्रवेश करता है । वह अपने माता-पिता के चरण स्पर्श नहीं करता तो गुरु को प्रणाम कैसे करेगा ? उधर शिक्षक भी बालकों को वह ममत्व और ज्ञान नहीं दे पाते जिसकी अपेक्षा करके बालक विद्यालय में प्रविष्ट हुआ है ।                    शिक्षक पर ट्यूशन पढ़ाने का आरोप प्रायः लगाया जाता है ! प्रश्न यह  ? कि शिक्षक ट्यूशन से क्या छात्रों का बौद्धिक विकास कर रहा है अथवा धनोपार्जन मात्र में लिप्त है । यदि मंद-बुद्धि बालक ट्यूशन से लाभान्वित होकर परीक्षा में उच्च अंक अर्जित कर सफल होते हैं तो ट्यूशन पाप कैसे है ? वह तो सहायता मात्र है, रिश्वत नहीं।  प्रतिष्ठित सामाजिक जीवन बिताने की लालसा शिक्षक में भी होती है। दरिद्रता का अभिशाप ओढ़कर भला वह कब तक जीवन-यापन करे ।        शासन की दोहरी नीति चिंता का विषय है,  शिक्षा में उदारीकरण और शिक्षक नियंत्रण द्वारा सरकार ट्यूशन को प्रतिबंधित करती है और गली-गली में खुल रहे कोचिंग संस्थानों को बढ़ावा देती है । एक परिपक्व तथा प्रशिक्षित अध्यापक अपने निवास पर छात्रों को अज्ञान से निकल कर प्रकाश की किरण देता है। परीक्षापयोगी दिशा निर्देश देता है, परन्तु आज प्रत्येक गली में अपरिपक्व, अप्रशिक्षित व अनुभवहीन छात्राध्यापकों द्वारा सीधे-सादे छात्रों का भविष्य बिगाड़ा जा रहा है। कक्षा से अरुचि उत्पन्न करके विद्यालय के ही समय में उनसे बेंच लगाकर धन उगाही की जा रही है। व्यवस्था की यह विश्रंखलता प्रबुद्ध सेवारत शिक्षक के पढ़ने को नैतिक अपराध मानता है ।        वस्तुस्थिति यह है कि आज का शिक्षक एक मशीनीकृत प्रक्रिया में कलपुर्जा मात्र बनकर रह गया है। वह कक्षा में स्वतंत्र अभिव्यक्ति देने में असमर्थ है। उसके निजी चिंतन-मनन का कोई अर्थ नहीं है वह निर्धारित पाठ्यक्रम और अवधि में सीमित होकर रह गया है। एक निश्चित समय-सारिणी के अंतर्गत वह एक कक्षा से दूसरी कक्षा में गमनागमन करता रहता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है। जिसमे महान वैज्ञानिक आर्कमिडीज और गणितज्ञ रामानुजन अनुत्तीर्ण हो जाते है।        फिर भी यह कहना यथेष्ट होगा की शिक्षक ही समाज का निर्माता है। अतः वह अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं हो सकता। समाज कितना ही दूषित हो। उसे अपने कर्तव्य-रथ पर आरूढ़ होकर ज्ञान का आलोक बिखेरना ही होगा, उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह किसी प्रकार के व्यसन में लिप्त ण होकर उत्तम आचरण का निर्वहन करे। प्रत्येक अध्यापक डॉ राधाकृष्णन या डॉ जाकिर हुसैन नहीं बन सकता किन्तु आदर्श शिक्षक बनकर छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत अवश्य बन सकता है। वह देवता न बने पर मनुष्य बनकर ही मानवता की बेल को हरा-भरा बनाये, शिक्षक का पद महन है अतः उसका आचरण गरिमायुक्त होना चाहिए।  कितना सुन्दर हो यदि शिक्षक दलीय राजनीति से ऊपर उठकर उन्मुक्त भाव से विद्यादान कर अपने शिष्यों में पुरुषार्थ-चतुष्टय सफल करें। शिक्षा का स्वरुप कितना ही विकृत एवं अशोभनीय हो। शिक्षार्थी के लिए उसका विद्यालय विश्वमंदिर से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। विद्यालय के गुरुजन ही उसके मन-मस्तिष्क में आलोक बिखेरने वाले प्रकाश-पुंज और सर्वथा वन्दनीय है।  वही विद्यार्थी देश और समाज का नाम ऊँचा करता है जो सदाचारी और परिश्रमी होता है। आचरण का महत्व सर्वोपरि है। वह इहलोक और परलोक दोनों में लाभकारी है।              आचाराल्लभते ह्रायुश्चाराल्लभते श्रियम ।             आचारात कीर्तिमाप्नोति पुरुष प्रेत्य चेह च । विद्या प्राप्ति एक अनवरत साधना है जिससे सफलता प्राप्त करने के लिए पञ्च लक्षण बताये गए हैं ---            काकचेष्टा वकोध्यानं, श्वाननिद्रा तथैव च।            अल्पाहारी, सदाचारी विद्यार्थी पञ्च लक्षण:। भारत ज्ञान-विज्ञान तकनीक तथा प्रौद्योगिकी, प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति-पथ पर अग्रसर है, प्रगति के इस दौर में कहीं हमारी सांस्कृतिक धरोहर छूट न जाये । भारत ने सदैव विश्व में ज्ञान की रश्मियाँ बिखेरी हैं,  हमें आशा है कि भारत में शिक्षा की यह विरासत सुरक्षित रहेगी। ईश्वर से हमारी मंगलकामना है कि हमारे देश के शिक्षार्थी, संयमी, धैर्यवान, विवेकशील व विद्याभिलाषी बनें। वे विवेकानन्द से प्रेरणा लेकर संसार में ज्ञान रुपी आलोक की ज्योति प्रसारित करें। तभी शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी की यह त्रिवेणी लोकमंगलकारी सिद्ध होगी ।हम तो बस यही कामना करते हैं कि………           असतो मा सद्गमय,           तमसो मा ज्योतिर्गमय,            मृत्योर्मामृतं गमय !