त्रिपुरा सफ़रनामा (भाग-एक) उनाकोटी की चट्टान पर नक्काशी और प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत है...------------------------------------------------- इस बार हमारी टीम ने त्रिपुरा भ्रमण की योजना बनाई।हालांकि यह पर्यटन की दृष्टि से बहुत मशहूर जगह नहीं है। क्योंकि यहां पर्यटन का उतना विकास भी नहीं किया गया है।ट्रेन से जुड़ाव भी कम ट्रेनों का ही है। लेकिन नयी नयी जगहों की खोज की लालसा में हम लोग इस बार त्रिपुरा निकल लिए।त्रिपुरा उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित भारत का एक छोटा सा राज्य है।यह भारत का तीसरा सबसे छोटा राज्य है। त्रिपुरा में कुल महज आठ जिले हैं।इसके उत्तर, पश्चिम और दक्षिण में बांग्लादेश स्थित है जबकि पूर्व में असम और मिजोरम स्थित है।हम लोग साथ में इक्कीस लोग प्रयागराज के छिवकी स्टेशन से अपना सफर आरंभ किए।टीम का नेतृत्व शिवकुमार व संतोष कुमार कर रहे थे।साथ में विष्णु मिश्र, महेंद्र मिश्र, दिनेश कुमार,शिव सागर मौर्य,सुनील कुमार,राम केवल वर्मा आदि साथियों के साथ सफ़र आरंभ किया। हालांकि ट्रेन चार घंटे बिलंब से आई। पैंतालीस घंटे के सफ़र के बाद हम लोग त्रिपुरा के धर्मपुर स्टेशन पर उतरे। उत्तर भारत जहां गर्मी में उबल रहा था। यहां मूसलाधार बारिश हो रही थी।तभी हम लोगों को अनुमान हो गया कि यहां यात्रा के लिए यह उचित समय नहीं है। फिर भी यात्रा को आगे बढ़ाया गया।एक बस से हम लोगों ने आगे का सफ़र शुरू किया। धर्मपुर स्टेशन से महज दस किलोमीटर की यात्रा करके हमलोग यहां के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल उनाकोटी पहुंच चुके थे। प्रकृति के सुरम्य वातावरण और हरी भरी वादियों में अनोखे सुख की प्राप्ति हो रही थी।उनाकोटि भारत के त्रिपुरा राज्य के उनाकोटि ज़िले के कैलाशहर उपखण्ड में स्थित एक ऐतिहासिक व पुरातत्त्विक हिन्दू तीर्थस्थल है यहाँ भगवान शिव को समर्पित मूर्तियाँ और स्थापत्य हैं जिनका निर्माण 7वीं – 9वीं शताब्दी ईसवी, या उस से भी पहले, बंगाल व पड़ोसी क्षेत्रों में पाल वंश के राजकाल में हुआ था।उनाकोटी का अर्थ है एक करोड़ से एक कम।इसके लिए एक दंतकथा है कि कल्लू नाम के एक कुम्हार ने शिव के साथ रहने की प्रार्थना की। शिव ने शर्त रखी कि यदि एक रात में वह शिव की एक करोड़ मूर्ति बना देगा तो वह शिव- पार्वती के साथ कैलास पर्वत जा सकेगा।कल्लू ने मूर्तिया बनाई परन्तु एक मूर्ति रह गई और सुबह हो गई। कल्लू वही रह गया। तब से इसका नाम उनाकोटी पड़ गया।यहाँ पहाड़ी को काटकर शिव की विशाल आधार मूर्तियाँ बनी हैं। यहाँ भगीरथ की प्रार्थना पर स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगा के अवतरण को चित्रित किया गया है कि वे गंगा को अपनी जटाओं में उलझा और फिर धीरे-धीरे पृथ्वी पर बढ़ने दें। पहाड़ों से कल कल बहते झरनों का मधुर स्वर मन को आनंदित कर रहा था। बारिश हो रही थी। लेकिन ऊंचाई पर जाने का मोह कोई नहीं छोड़ पा रहा था।सबने पहाड़ी पर ट्रेकिंग का आनंद लिया।इस जगह की यादों को सबने फोटो वीडियो के रूप में मोबाइल में कैद किया। फिर हम लोग अगले पड़ाव की ओर बढ़ चुके थे। जहां हम लोगों को रात्रि विश्राम करना था।अब हम लोग जम्पुई हिल्स क्षेत्र में पहुंच चुके थे।हम लोग इडेन टूरिस्ट लाज में रात्रि प्रवास के लिए रूके। पहाड़ों के बीच में यह विशाल आवासीय परिसर था। जहां पर्याप्त रूप से कमरे उपलब्ध थे।जो एक तरह से सस्ते भी थे।दो हजार रूपए में एसी रूम मिल गया था। जिसमें तीन लोग आराम से रह सकते थे।हर रूम में एक किंग साइज का और एक क्वीन साइज़ का बेड उपलब्ध था। यहीं पर मेस में खाने की व्यवस्था भी उपलब्ध थी।पर प्योर वेज वालों को थोड़ी सी समस्या हो रही थी जो होनी भी थी। क्योंकि पहाड़ों पर नानवेज खानों की ज्यादा मांग रहती है और यहां के लोग मछली चावल खूब प्रेम से खाते भी हैं। गेहूं की रोटी मिलना बहुत मुश्किल काम होता है। पूड़ी-सब्जी मिलती तो है लेकिन पूड़ी मैदे की ही ज्यादा बनाते हैं।अब सभी लोग सोने की तैयारी में थे।कल सुबह फिर नये डेस्टीनेशन पर निकलना था... क्रमशः... भारतेन्द्र कुमार त्रिपाठी
यात्रा वृत्तांत
Literature
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15
Jun 2024 2:34 PM
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